मैं उस रात को आज भी नहीं भूला। शिवरात्रि की उस रात, जब मंदिर से लौटकर मैं अपने कमरे में बैठा था, आँखें बंद थीं, धूप की गंध कमरे में घुली हुई थी, और बाहर से शंख की आवाज़ आ रही थी। अचानक मेरी रीढ़ की हड्डी के आधार में एक अजीब-सी गर्माहट उठी। न दर्द था, न असुविधा, बस एक लहर थी, जो धीरे-धीरे ऊपर उठ रही थी। मैं घबरा गया। मैंने आँखें खोलीं। वह अनुभव वहीं थम गया। उस रात मुझे एहसास हुआ कि मैं कुण्डलिनी के बारे में वर्षों से पढ़ता रहा था, लेकिन असल में मैंने उसे समझा ही नहीं था। और शायद आप भी नहीं समझे।
हम सब ने कुण्डलिनी को एक "concept" की तरह समझा है। सात चक्र, रंग, बीज मंत्र, चार्ट पर बने चित्र, यह सब हमने रट लिया। लेकिन कुण्डलिनी कोई चार्ट नहीं है। यह कोई PowerPoint presentation नहीं है जिसे देखकर आप कह दें "हाँ, समझ गया।" कुण्डलिनी एक जीवित शक्ति है, ठीक वैसे ही जैसे शिव स्वयं। और शिव को भी हमने उसी तरह गलत समझा है। शिव को हम मंदिर में बिठाकर "भगवान" बना देते हैं। फूल चढ़ाते हैं, घंटी बजाते हैं, और घर चले आते हैं। लेकिन शिव का स्वरूप क्या है? वह महाश्मशान में बैठे हैं। भस्म रमाई हुई है। न कोई राजमहल, न कोई आभूषण। वह नग्न सत्य हैं। वह उस अवस्था का प्रतीक हैं जब इंसान अपने हर आवरण को उतार देता है, हर अहंकार को, हर भूमिका को, हर पहचान को। और यही कुण्डलिनी जागरण है। यह कोई "superpower" नहीं है। यह आपका सबसे बड़ा आवरण उतरने की प्रक्रिया है।
हम कुण्डलिनी को एक "achievement" की तरह ट्रीट करते हैं। जैसे कोई exam हो। "मेरा मूलाधार चक्र खुल गया", यह वाक्य आपने सोशल मीडिया पर ज़रूर पढ़ा होगा। लेकिन सच यह है कि जो व्यक्ति सच में कुण्डलिनी के किसी भी स्तर से गुज़रता है, वह इसे status update नहीं बनाता। वह चुप हो जाता है। क्योंकि उसके पास शब्द नहीं बचते उस अनुभव को बयान करने के लिए। शिव को देखिए, वह त्रिलोकनाथ हैं, लेकिन कैलाश पर बैठे हैं। मौन में। समाधि में। उनका जीवन ही उत्तर है उस प्रश्न का जो कुण्डलिनी पूछती है "तुम कौन हो, इन सब भूमिकाओं के परे?"
अब बात करते हैं उस सबसे बड़ी गलतफहमी की कुण्डलिनी जागरण को लोग एक "event" मानते हैं। जैसे एक दिन सुबह उठे और "जागरण" हो गया। यूट्यूब पर videos हैं "7 दिन में कुण्डलिनी जागरण।" भाई, 7 दिन में कुण्डलिनी जागरण हो जाए, तो फिर शिव ने हज़ारों वर्षों तक तपस्या क्यों की? भस्मासुर से लेकर सती के वियोग तक शिव का जीवन स्वयं एक साधना है। वह हमें यही बता रहे हैं कि यह यात्रा क्षणिक नहीं है। कुण्डलिनी एक प्रक्रिया है जो जन्मों से चल रही है। और इस जन्म में आप बस उस प्रक्रिया के एक पड़ाव पर हैं। मुझे याद है, एक बार मैं उत्तराखंड गया था। केदारनाथ के रास्ते पर, जहाँ अभी भी बर्फ थी, एक बुज़ुर्ग साधु मिले। उनके पास न फोन था, न सामान। बस एक कमंडल। मैंने उनसे पूछा "बाबा, कुण्डलिनी जागरण कैसे होता है?" उन्होंने मेरी तरफ देखा। लंबी चुप्पी के बाद बोले "पहले यह बताओ, क्या तुम सच में जानना चाहते हो? या बस 'जाग्रत' कहलाना चाहते हो?" वह प्रश्न आज भी मेरे भीतर गूँजता है।
असल में कुण्डलिनी कोई "energy" नहीं है जिसे आप activate करें जैसे कोई switch दबा दो। कुण्डलिनी वह शक्ति है जो पहले से जाग्रत है, बस आप उसकी अनुभूति से अनजान हैं। ठीक वैसे ही जैसे शिव सदा विद्यमान हैं, बस आपकी आँखें बंद हैं। कुण्डलिनी साधना आँखें खोलने की प्रक्रिया है, शक्ति उत्पन्न करने की नहीं। और यह आँखें खोलना आसान नहीं है। क्योंकि जब कुण्डलिनी जागती है, सच में जागती है तो सबसे पहले वह आपके सबसे गहरे भय, आपकी सबसे पुरानी चोटें, आपके वह संस्कार जिन्हें आप भूल चुके थे, सब बाहर लाती है। यह शिव का तांडव है। तांडव विनाश नहीं है, तांडव परिवर्तन है। पुराने को तोड़कर नए का निर्माण। एक और बात जो कोई नहीं बताता, कुण्डलिनी जागरण के दौरान अक्सर लोग टूटते हैं, पहले। रिश्ते बदल जाते हैं। जो काम वर्षों से करते आ रहे थे, वह अर्थहीन लगने लगता है। जो लोग "अपने" लगते थे, वह परायों जैसे लगने लगते हैं। यह breakdown नहीं है, यह breakthrough की तैयारी है। शिव जब सती को खोते हैं, तो वह टूट जाते हैं। लेकिन वही टूटना उन्हें महाकाल बनाता है। समझे? जो टूटा नहीं, वह बना नहीं।
और सबसे ज़रूरी बात, कुण्डलिनी कोई "solo journey" नहीं है। शिव और शक्ति अलग नहीं हैं। अर्धनारीश्वर का स्वरूप यही कहता है। कुण्डलिनी शक्ति है और शिव उसका आधार। आप बिना शिव-तत्त्व के, यानी बिना शांत, स्थिर और साक्षी चेतना के, कुण्डलिनी को धारण नहीं कर सकते। इसीलिए साधना में पहले शांति आती है, फिर शक्ति। जो सिर्फ शक्ति चाहते हैं, शांति नहीं, वह कुण्डलिनी नहीं, अहंकार जगाते हैं।
तो क्या करें? कुछ "techniques" नहीं बताऊँगा। क्योंकि technique से कुण्डलिनी नहीं जागती, समर्पण से जागती है। शिव के चरणों में जब आप वास्तव में झुकते हैं, न दिखावे के लिए, न किसी इच्छा के लिए, बल्कि इसलिए कि आप जानते हैं कि आपको पता नहीं है, उस क्षण में कुण्डलिनी हिलती है। रोज़ सुबह उठकर 10 मिनट शांत बैठिए। कोई app नहीं, कोई guided meditation नहीं। बस आप और आपकी साँस। और एक प्रश्न अपने भीतर रखिए, "मैं कौन हूँ?" इसका उत्तर मत खोजिए। बस प्रश्न को जीने दीजिए। यही कुण्डलिनी साधना का असली पहला कदम है। शिव ने कहा है और तंत्र शास्त्र इसका साक्षी है "शक्ति के बिना शिव, शव है।" लेकिन शक्ति बिना शिव के, तूफान है। दोनों का संतुलन ही मोक्ष है। और वह संतुलन ढूँढना, यही आध्यात्मिक यात्रा है। आपकी यात्रा शुरू हो चुकी है। शायद तभी से, जब आप यह पढ़ रहे थे।
🔱 हर हर महादेव
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