हम सभी ने अपने जीवन में कभी न कभी क्रोध या गुस्से के उस भयानक सैलाब को महसूस किया है, जो जब आता है तो हमारे सोचने-समझने की शक्ति को पल भर में भस्म कर देता है। गुस्सा आने के बाद जब हमारा मन शांत होता है, तो पीछे केवल पछतावा, बिखरे हुए रिश्ते और एक गहरी मानसिक अशांति ही रह जाती है। इंटरनेट पर लोग अक्सर गुस्से को काबू करने के मनोवैज्ञानिक तरीकों या दवाओं के बारे में खोजते हैं, लेकिन जब तक हम इसके मूल तक नहीं पहुँचेंगे, तब तक हम इस पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते। यदि हम इस समस्या को आध्यात्मिक दृष्टि से देखें, तो क्रोध कोई बाहरी बीमारी या अचानक आने वाली कोई भावना नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर छिपे गहरे अज्ञान, अतृप्त इच्छाओं और हमारी चेतना की सोई हुई अवस्था का एक स्पष्ट लक्षण है। अध्यात्म हमें सिखाता है कि जिसे हम गुस्सा कहते हैं, वह असल में हमारी अधूरी रह गई कामनाओं, हमारे डर और हमारे अहंकार का ही एक उग्र रूप है। जब बाहरी परिस्थितियां हमारी मर्जी के मुताबिक नहीं चलतीं या जब कोई इंसान हमारे बनाए गए नियमों के खिलाफ काम करता है, तो हमारे भीतर बैठा 'मैं' आहत हो जाता है, और इसी आहत भावना की हिंसक प्रतिक्रिया को हम गुस्सा कहते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से गुस्से के सबसे बड़े और गहरे कारण को अगर हम टटोलें, तो वह सीधे हमारे अहंकार (Ego) से जुड़ा हुआ है। अहंकार हमेशा खुद को केंद्र में रखना चाहता है, उसकी यह चाहत होती है कि पूरी दुनिया, सारे इंसान और हर परिस्थिति उसके नियंत्रण में रहे। जब हम खुद को अपने इस भौतिक शरीर, पद, प्रतिष्ठा या अपने विचारों से पूरी तरह जोड़ लेते हैं, तो हमारी आँखों पर एक भ्रम का पर्दा बंध जाता है। जैसे ही कोई हमारी कमियों को उजागर करता है, हमारी आलोचना करता है या हमारे मान-सम्मान को ठेस पहुँचाता है, तो हमारा यह असुरक्षित अहंकार अपनी सुरक्षा के लिए गुस्से का मुखौटा पहन लेता है। गुस्सा असल में एक सुरक्षा तंत्र है जो अहंकार खुद को बचाने के लिए इस्तेमाल करता है। इसके अलावा, हमारे भीतर छिपी हुई तीव्र इच्छाएं और आसक्तियां भी क्रोध को जन्म देती हैं, जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगा लेते हैं और वह उम्मीद टूटती है, तो मन में पैदा होने वाली निराशा सीधे गुस्से में बदल जाती है। यहाँ हमें चेतना और ऊर्जा के उस परम शाश्वत नियम को समझना होगा कि ब्रह्मांड अंत में हमारी भावनाओं पर प्रतिक्रिया करता है, न कि हमारे शब्दों पर। जब हमारे भीतर लगातार क्रोध, ईर्ष्या और असंतोष की तरंगे उठ रही होती हैं, तो हमारे शब्द चाहे कितने भी शांत क्यों न हों, हमारी आंतरिक नकारात्मक ऊर्जा हमारे पूरे अस्तित्व को दूषित कर देती है और हम अनजाने में अपने जीवन में और अधिक अशांत परिस्थितियों को आकर्षित करने लगते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता जैसे महान आध्यात्मिक ग्रंथों में भी यह बहुत स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि जब इंसान सांसारिक वस्तुओं या इच्छाओं के बारे में लगातार सोचता रहता है, तो उसके भीतर ओवरथिंकिंग और आसक्ति का जन्म होता है। इस आसक्ति से कामना पैदा होती है और जब उस कामना के पूरा होने में कोई बाधा आती है, तो वहीं से क्रोध का जन्म होता है। क्रोध से बुद्धि का नाश होता है, यानी इंसान की सही और गलत को समझने की चेतना पूरी तरह लुप्त हो जाती है, और बुद्धि नाश होने से व्यक्ति का पतन हो जाता है। गुस्सा असल में एक ऐसा कोयला है जिसे हम दूसरों पर फेंकने के लिए अपने हाथ में उठाते हैं, लेकिन उसे फेंकने से पहले हमारा अपना ही हाथ पूरी तरह जल जाता है। जब व्यक्ति क्रोध की अवस्था में होता है, तो वह वर्तमान क्षण से पूरी तरह कट जाता है और अतीत के गड़े मुर्दे उखाड़ने लगता है या भविष्य को नष्ट करने पर उतारू हो जाता है। इस अशांति के दौर में इंसान के भीतर से करुणा, प्रेम और 'एक्टिव लिसनिंग' यानी दूसरों के दृष्टिकोण को समझने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो जाती है। जब हम दूसरों को सुनना और समझना बंद कर देते हैं, तो हमारे बीच संवाद की जगह केवल चीख-पुकार ले लेती है, जो हमारे अपनों के दिलों के बीच एक बहुत ऊंची और अभेद्य दीवार खड़ी कर देती है।
इस भीतर जलती हुई क्रोध की अग्नि को शांत करने और इसे सकारात्मक ऊर्जा में बदलने का एकमात्र आध्यात्मिक मार्ग है 'साक्षी भाव' और सजगता जिसे हम माइंडफुलनेस भी कहते हैं। जब भी आपके भीतर गुस्से का तूफान उठने लगे, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने या चिल्लाने के बजाय, कुछ पलों के लिए पूरी तरह मौन हो जाएं। एक कदम पीछे हटें और अपने भीतर उठ रहे उस गुस्से को, उस कँपकँपी को और उस भारीपन को केवल एक गवाह की तरह देखना शुरू करें। आपको यह गहरा बोध होना चाहिए कि आप वह गुस्सा नहीं हैं, गुस्सा तो केवल एक तैरते हुए काले बादल की तरह है जो आपके मन के आकाश में आया है और थोड़ी देर में चला जाएगा, लेकिन आप वह शाश्वत आकाश हैं जो हमेशा साफ और शांत रहता है। जैसे ही आप गुस्से से अपनी पहचान को अलग कर लेते हैं, उसकी पूरी ताकत पल भर में समाप्त हो जाती है। इसके साथ ही, ध्यान (Meditation) का नियमित अभ्यास आपके भीतर की सोई हुई चेतना को जगाता है, जिससे मन का अनचाहा शोर अपने आप थमने लगता है। जब आप अपनी आती-जाती सांसों के प्रति सजग होते हैं, तो आपका तंत्रिका तंत्र शांत होता है और आपके भीतर एक असीम आंतरिक शांति का उदय होता है।
इसके अतिरिक्त, अपने जीवन में कृतज्ञता यानी ग्रैटिट्यूड और करुणा के भाव को शामिल करना गुस्से की सबसे बड़ी काट है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि इस संसार में कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं है और हर व्यक्ति अपनी-अपनी समझ व संस्कारों के हिसाब से जीवन जी रहा है, तो हमारे भीतर दूसरों के प्रति क्षमा का भाव पैदा होता है। दूसरों को माफ करना कमजोरी नहीं, बल्कि एक बहुत उच्च आध्यात्मिक चेतना और आत्म-सम्मान की निशानी है। अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए, खुद के प्रति थोड़े दयालु बनें और अपनी चेतना को हमेशा जमीन से जोड़कर रखें। यह जीवन बहुत छोटा और अनमोल है, इसे गुस्से, अहंकार और नफरत की भेंट चढ़ाने के बजाय प्रेम, आनंद और मौन से भर दें। जब आपके भीतर विचारों का यह शोर थमेगा और आप इस वर्तमान क्षण को पूरी तरह से स्वीकार कर लेंगे, तब आप पाएंगे कि गुस्सा तो केवल एक भ्रम था जो आपकी अज्ञानता के कारण बढ़ रहा था; और जैसे ही सजगता का दीया जलेगा, आपके भीतर उस परम आनंद और शांति का झरना फूट पड़ेगा जो इस संसार की किसी भी बाहरी परिस्थिति से कभी प्रभावित नहीं होता, और यहीं से एक दिव्य व सुंदर जीवन की शुरुआत होती है।
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